माँ प्रकृति से दूर हो तुम , इसलिए मजबूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात..फिर भी,किस नशे में चूर हो तुम।।
माँ प्रकृति से........
झील,पनघट,कुंड,पोखर, सबके जल खारे किये हैं,
पेड़-पौधे, बाग़, जंगल, काट, घर-द्वारे किये हैं।
जिस हवा से प्राण पाया उसको भट्ठे- चिमनियों से,
कार्बन दिन रात देकर, तुमने अंगारे दिए हैं।।
अपने पैरों पर कुल्हाड़ी रखके भी मग़रूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात...फिर भी......
आँख से दिखता नहीं है माँ प्रकृति का इक खिलौना,
देख लो जीवन को कैसे मोड़ पर लाया कोरोना ।
प्रकृति का है अर्थ केवल आदमी,,ये भ्रम न पालो,
गलतियाँ जितनी करोगे उतना तो होगा ही रोना।।
दर्प, वैभव, सभ्यता लुटती है, चकनाचूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात...फिर भी......
आदतें अपनी सुधारो खान बदलो पान बदलो,
आर्टीफिशियल हुई है सभ्यता की शान बदलो।
इसकी रक्षा तुम करो रक्षक तुम्हारी ये बनेगी,
ग्लोबलाइज़ आदमी तुम अपने को इंसान बदलो।।
बस इसी इक शर्त पर तो प्रकृति को मंजूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात...फिर भी......
माँ प्रकृति से दूर हो तुम , इसलिए मजबूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात..फिर भी,किस नशे में चूर हो तुम।।
-भारत भूषण शर्मा
गोवर्धन, मथुरा