Tuesday, April 14, 2020

क्यों प्रकृति से दूर हो तुम

माँ प्रकृति से दूर हो तुम , इसलिए मजबूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात..फिर भी,किस नशे में चूर हो तुम।।
माँ प्रकृति से........

झील,पनघट,कुंड,पोखर, सबके जल खारे किये हैं,
पेड़-पौधे, बाग़, जंगल, काट, घर-द्वारे किये हैं।
जिस हवा से प्राण पाया उसको भट्ठे- चिमनियों से,
कार्बन दिन रात देकर,  तुमने अंगारे दिए हैं।।
अपने पैरों पर कुल्हाड़ी रखके भी मग़रूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात...फिर भी......

आँख से दिखता नहीं है माँ प्रकृति का इक खिलौना,
देख लो जीवन को  कैसे  मोड़ पर लाया कोरोना ।
प्रकृति का है अर्थ केवल आदमी,,ये भ्रम न पालो,
गलतियाँ  जितनी  करोगे उतना तो होगा ही रोना।।
दर्प, वैभव, सभ्यता लुटती है, चकनाचूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात...फिर भी......

आदतें अपनी सुधारो खान बदलो पान बदलो,
आर्टीफिशियल हुई है सभ्यता की शान बदलो।
इसकी रक्षा तुम करो रक्षक तुम्हारी ये बनेगी,
ग्लोबलाइज़ आदमी तुम अपने को इंसान बदलो।।
बस इसी इक शर्त पर तो प्रकृति को मंजूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात...फिर भी......

माँ प्रकृति से दूर हो तुम , इसलिए मजबूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात..फिर भी,किस नशे में चूर हो तुम।।

-भारत भूषण शर्मा
  गोवर्धन, मथुरा

9 comments:

  1. Cool bro... Good collection of poems👍

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  2. अद्भुत,अद्वितीय रचना,
    मॉं सरस्वती का आशीर्वाद इसी तरह सदैव ही आप पर बना रहे।ऐसी हमारी कामना है।👌👌👌👏👏👏👍👍🎁🎁💐💐🌺🌺🌺

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  3. Likhne k liye bhaav chahiye ye aapki har kavita me dikhta hai...
    Trayambak

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  4. शानदार शब्दों में उत्कृष्ट भाव पिरोए हैं.. बहुत बढ़िया

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  5. अत्यंत उत्कृष्ट प्रस्तुति.... ये विषय तो निःसन्देह चिंतनयोग्य एवं गहन आत्मबोध के योग्य है, परन्तु इसको प्रस्तुत करती पंक्तियों को जिस तरह सुगम धारा प्रवाह में पिरोया गया है वह अत्यंत आकर्षक है... रोष एवं आशंका को आकर्षक रूप से व्यक्त करना सरल कार्य नही है।

    👍👍👍

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