Wednesday, April 22, 2020

मातृ की सत्ता

चक्की अपमानों की अहिल्या को ,जड़ कर डाला ऐसे दला हो,
अपने ही कुल ने कुल वृद्धों के सम्मुख पांचाली को छला हो,
जिसने श्रष्टि रची उसको ही,यूँ सोचे जैसे अबला हो,
मातृ की सत्ता को जो नकारे उस इंसान का कैसे भला हो।
-भारत भूषण शर्मा
 गोवर्धन मथुरा
(30.08.17)

Tuesday, April 14, 2020

क्यों प्रकृति से दूर हो तुम

माँ प्रकृति से दूर हो तुम , इसलिए मजबूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात..फिर भी,किस नशे में चूर हो तुम।।
माँ प्रकृति से........

झील,पनघट,कुंड,पोखर, सबके जल खारे किये हैं,
पेड़-पौधे, बाग़, जंगल, काट, घर-द्वारे किये हैं।
जिस हवा से प्राण पाया उसको भट्ठे- चिमनियों से,
कार्बन दिन रात देकर,  तुमने अंगारे दिए हैं।।
अपने पैरों पर कुल्हाड़ी रखके भी मग़रूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात...फिर भी......

आँख से दिखता नहीं है माँ प्रकृति का इक खिलौना,
देख लो जीवन को  कैसे  मोड़ पर लाया कोरोना ।
प्रकृति का है अर्थ केवल आदमी,,ये भ्रम न पालो,
गलतियाँ  जितनी  करोगे उतना तो होगा ही रोना।।
दर्प, वैभव, सभ्यता लुटती है, चकनाचूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात...फिर भी......

आदतें अपनी सुधारो खान बदलो पान बदलो,
आर्टीफिशियल हुई है सभ्यता की शान बदलो।
इसकी रक्षा तुम करो रक्षक तुम्हारी ये बनेगी,
ग्लोबलाइज़ आदमी तुम अपने को इंसान बदलो।।
बस इसी इक शर्त पर तो प्रकृति को मंजूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात...फिर भी......

माँ प्रकृति से दूर हो तुम , इसलिए मजबूर हो तुम।
कुछ नहीं औकात..फिर भी,किस नशे में चूर हो तुम।।

-भारत भूषण शर्मा
  गोवर्धन, मथुरा

Thursday, February 14, 2019

तिरंगे की खातिर......

हँसते हँसते जान लुटाकर गये तिरंगे की खातिर,,,,
दिल के सब अरमान लुटाकर गये तिरंगे की खातिर,,,,
पत्नी का सिन्दूर , बहन की राखी , खिलौने बच्चों के,,,
अपना सब सामान लुटाकर गए तिरंगे की खातिर.....
-भारत भूषण शर्मा

Wednesday, October 11, 2017

बस यूँ ही..

बहुत दौलत बहुत ताकत से बेशक़ नाम बढ़ता हो,,
कभी दो पल ठहरना जिस जगह ईमान पड़ता हो,,,
तुम्हारे नाम भी है एक कोना देखते जाना,,,
कहीं राहों में आते जाते गर श्मशान पड़ता हो।।
-भारत भूषण शर्मा
गोवर्धन, मथुरा

Sunday, October 1, 2017

प्रार्थना...शक्ति स्वरूपा बेटियों के लिए


बेटियों के भाग्य तुम लिखना विधाता प्यार से,
हर घड़ी हर इक खुशी इनसे मिले बस प्यार से।

रोक ना ले चूल्हा चौका चाखी इनके भाग को,
लेके परचम बेटियाँ आती दिखें हर द्वार से।

आज का ये दौर इतना तो बदलना चाहिए,
बेटियों के जन्मदिन लगने लगें त्यौहार से।

हर कदम आगे बढ़ें, मंज़िल मिले फूलें फलें,,
डगमगाएँ ना कभी संघर्ष से या हार से।
बेटियों के भाग्य तुम लिखना विधाता प्यार से

-भारत भूषण शर्मा
गोवर्धन, मथुरा

Saturday, September 23, 2017

मत पूछो

कितना उसको प्यार किया है ...मत पूछो,
किसका क्या उपकार किया है... मत पूछो।

साँसों की तो उल्टी गिनती जारी है,
कैसा कारोबार किया है... मत पूछो।

चुगली झूठ गलतफहमी से रंग रंगकर,
जीवन का अखबार किया है ...मत पूछो।

माँ बाबूजी दादी चाची गाँव में हैं,
शहर में क्या घरबार किया है... मत पूछो।

दिल की नज़रों में तो अब भी भोला हूँ,
सबने क्या इज़हार किया है ...मत पूछो।

-भारत भूषण शर्मा
गोवर्धन, मथुरा

Monday, August 28, 2017

मेरी याद......

मेरी याद तुमको भी आती तो होगी ,
सदा मेरी तुम तक भी जाती तो होगी ,
वो काज़ी वो फ़ितरत वो फ़तवा जुदाई ,
तुम्हे फुर्सतों में रुलाती तो होगी।

सियासत का इक़बाल मर क्यों गया है ,
अज़ाबों से ईमान डर क्यों गया है ,
जिसे गरज़ हो बस ख़िलाफ़त करे वो ,
ये बाकी का अफ़सोस घर क्यों गया है ,
वो आदिल के ज़िंदा न रहने की आतिश ,
इबादत को तेरी जलाती तो होगी।
तुम्हे फुर्सतों में रुलाती तो होगी।
मेरी याद तुमको भी आती तो  होगी.....

(क्रमशः )
फ़ितरत = स्वभाव  अज़ाब = कष्ट , आदिल= नेक ,सच्चा  आतिश = आग

 -भारत भूषण शर्मा
गोवर्धन मथुरा