Saturday, December 20, 2014

दास्ताँ.....

लबों पर दास्ताँ दिल की संभालती थी मचलती थी 
किनारे आँख के आकर ना जाने क्यों फिसलती थी। 
सुलगती थी जो दिल में आग बनकर ढूंढ़ता उसको 
कोई पगली थी जो जलती थी और खुद ही पिघलती थी। 

कभी आईना देखा तो लगा तस्वीर है मेरी 
अगर देखी  हथेली तो लगा तक़दीर है मेरी। 
मेरी तस्वीर और तक़दीर में कोई नहीं थी वो 
मेरी नज़रें ही ज़ालिम थी सितमग़र मुझको छलती थी। 


अगर दीदार हो जाता खुमारी दिल की मिट जाती 
घटायें जो उदासी की उमड़ती है वो छट जाती। 
मेरी तक़दीर का शीशा तो बच जाता चटकने से 
वो धारा भी तो रुक जाती जो आखों से निकलती थी। 



Tuesday, December 9, 2014

परछाई से प्यार ...

मैं लहरों से लड़ा फिर भी समन्दर पार  कर आया ..... 
मैं जीतूंगा तुझे सब इस भरम में हारकर आया ..... 
मेरी चाहत से भी आँखों में तेरी बर्फ ना पिघली.... 
ये लगता है तेरी परछाई से में प्यार कर आया…

वो ऐसा शख़्स....

न कोई सुन सके छुपकर तुम्हारा नाम लेता है...
तुम्हें ख्वाबों में पाकर दिल की धड़कन  थाम लेता है…
नहीं खोया बहुत तुमने मगर इक शख़्स खोया है ....
वो ऐसा शख़्स शीशे में तुम्हें पहचान लेता है…