Saturday, December 20, 2014

दास्ताँ.....

लबों पर दास्ताँ दिल की संभालती थी मचलती थी 
किनारे आँख के आकर ना जाने क्यों फिसलती थी। 
सुलगती थी जो दिल में आग बनकर ढूंढ़ता उसको 
कोई पगली थी जो जलती थी और खुद ही पिघलती थी। 

कभी आईना देखा तो लगा तस्वीर है मेरी 
अगर देखी  हथेली तो लगा तक़दीर है मेरी। 
मेरी तस्वीर और तक़दीर में कोई नहीं थी वो 
मेरी नज़रें ही ज़ालिम थी सितमग़र मुझको छलती थी। 


अगर दीदार हो जाता खुमारी दिल की मिट जाती 
घटायें जो उदासी की उमड़ती है वो छट जाती। 
मेरी तक़दीर का शीशा तो बच जाता चटकने से 
वो धारा भी तो रुक जाती जो आखों से निकलती थी। 



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