Wednesday, August 17, 2016

जान समझ बैठा ........

तुझको अपनी खुद को तेरी जान समझ बैठा,
तेरी इक मुस्कान को मैं अंजाम समझ बैठा ।
मैं दीवाना तुझको अपनी जान समझ बैठा,
तेरी इक मुस्कान को मैं अंजाम समझ बैठा ।।

जब तुझको मंज़ूर नहीं था क्यों इकरार किया,
हंसकर तूने क्यों हाँ कह दी ना इनकार किया ।
प्यार की इस हलचल को मई तूफ़ान समाज बैठा
तेरी इक मुस्कान को मैं अंजाम समझ बैठा ।।

मैं समझा  था जीवन अपना मैंने तेरे नाम किया,
नहीं भरोसा तुझको मुझ पर तूने ये पैगाम दिया ।
तेरे इस पैगाम को मैं इलज़ाम समझ बैठा
तेरी इक मुस्कान को मैं अंजाम समझ बैठा ।।

चला ताश का घर मैं बनाने देखा नहीं कि रेती थी,
वो टुकड़े टूटे दर्पण के जिनमे सूरत देखी  थी ।
टूटे कांच के टुकड़ों को मैं ज़ाम समझ बैठा
तेरी इक मुस्कान को मैं अंजाम समझ बैठा ।


-भारत भूषण शर्मा
(मई २००५ )

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