अरमानों को धीरे धीरे छाँट रहा हूँ...
ए ज़िंदगी देख मैं तुझे काट रहा हूँ।
तूने मुझको,मैंने तुझको खूब छकाया...
तू अपने मैं अपने रस्ते छाँट रहा हूँ।
तुझसे काँटे फूल मिले हैं मुझको दोनों,,,
ज़िंदगी देख मैं सिर्फ गुलाब बाँट रहा हूँ।
डूब न जाये वो इन आँखों के दरिया में..
इस खातिर बस पास न आये डाँट रहा हूँ।
#भारत भूषण शर्मा
ज़िंदगी देख मैं सिर्फ गुलाब बाँट रहा हूँ।
डूब न जाये वो इन आँखों के दरिया में..
इस खातिर बस पास न आये डाँट रहा हूँ।
#भारत भूषण शर्मा
awesome sir...last line mujje samjhh nhi aayi..
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