रोज़ आते रहे रोज़ जाते रहे ,
ख्वाब में तुम मुझे यूँ सताते रहे।
मेरी चाहत का तो हौंसला देखिये,
रूठते तुम रहे हम मनाते रहे।
इश्क़ में हाँ मेरी ना तुम्हारी रही,
दोनों हर मोड़ पर ये जताते रहे।
बाप माँ मर गए भूख से जूझकर ,
श्राद्ध में बच्चे भोजन कराते रहे।
रोटियां वोट की सेंकने के लिए,
जाति मज़हब को नेता लड़ाते रहे।
हो भला या बुरा देश का , फ़र्क़ क्या ,
वो तुम्हें तुम उन्हें आज़माते रहे।
खूब रोतीं है इंसानियत हो विवश ,
जिसको हो गर्ज़ वो चुप कराते रहे।
रस्मे कस्मे हवाला उन्हें कीजिये,
मरते दम तक जो उनको निभाते रहे।
-भारत भूषण शर्मा
गोवर्धन ,मथुरा
9634207514
No comments:
Post a Comment