Friday, May 12, 2017

ए ज़िंदगी.......


अरमानों को धीरे धीरे छाँट रहा हूँ...
ए ज़िंदगी देख मैं तुझे काट रहा हूँ।
तूने मुझको,मैंने तुझको खूब छकाया...
तू अपने मैं अपने रस्ते छाँट रहा हूँ।
तुझसे काँटे फूल मिले हैं मुझको दोनों,,,
ज़िंदगी देख मैं सिर्फ गुलाब बाँट रहा हूँ।
डूब न जाये वो इन आँखों के दरिया में..
इस खातिर बस पास न आये डाँट रहा हूँ।
#भारत भूषण शर्मा

Wednesday, August 17, 2016

जान समझ बैठा ........

तुझको अपनी खुद को तेरी जान समझ बैठा,
तेरी इक मुस्कान को मैं अंजाम समझ बैठा ।
मैं दीवाना तुझको अपनी जान समझ बैठा,
तेरी इक मुस्कान को मैं अंजाम समझ बैठा ।।

जब तुझको मंज़ूर नहीं था क्यों इकरार किया,
हंसकर तूने क्यों हाँ कह दी ना इनकार किया ।
प्यार की इस हलचल को मई तूफ़ान समाज बैठा
तेरी इक मुस्कान को मैं अंजाम समझ बैठा ।।

मैं समझा  था जीवन अपना मैंने तेरे नाम किया,
नहीं भरोसा तुझको मुझ पर तूने ये पैगाम दिया ।
तेरे इस पैगाम को मैं इलज़ाम समझ बैठा
तेरी इक मुस्कान को मैं अंजाम समझ बैठा ।।

चला ताश का घर मैं बनाने देखा नहीं कि रेती थी,
वो टुकड़े टूटे दर्पण के जिनमे सूरत देखी  थी ।
टूटे कांच के टुकड़ों को मैं ज़ाम समझ बैठा
तेरी इक मुस्कान को मैं अंजाम समझ बैठा ।


-भारत भूषण शर्मा
(मई २००५ )

कोसी से कैसा सन्देश ???

कोसी तेरी इन लहरों का कहर बड़ा ही मतवाला ,
जीवन के खुशहाल खेत को तूने बंज़र कर डाला । 
कोसी तेरी इन लहरों का......................

 भाई बिछड़ा बहन से बेटी माँ से दूर हुई है,
बूढी माँ बेटे को खोकर ग़म में चूर हुई है। 
पिता की आँखों की उम्मीदें चकनाचूर हुई हैं ,
बेटे की इच्छाओं की साँसे मज़बूर हुई हैं ॥ 
जीवन दायिनी तूने जीवन का ही अर्थ बदल डाला 
कोसी तेरी इन लहरों का......................

अब किलकारी चीखें बनकर ज़ेहन में चलती हैं,
रहत शिविरों में नन्ही साँसे कैसे चलती हैं । 
जो नवजात यहाँ शिविरों में बिना दूध भूखे हैं ,
उनकी साँसों से पूछो साँसे कैसे चलती हैं ॥ 
आँखोँ में जो नीर बचा था अपने संग बहा डाला 
कोसी तेरी इन लहरों का......................

बख्शा एक न हिन्दू तूने मुसलमान भी ना बख्शा ,
पंडित क्षत्रिय वैश्य शूद्र की कौन करेगा अब रक्षा । 
बंटवारे की नयी लकीरें मालिक को मंज़ूर नहीं ,
ख़तम करो ये अभी नहीं फिर कभी न कहना ना  बख्शा ॥ 
नादानों अब तो कुछ समझो समझाता ऊपर वाला 
कोसी तेरी इन लहरों का......................


-भारत भूषण शर्मा 
(जुलाई २००८ में लिखी  कोसी नदी में आयी बाढ़ पर )

जाना नहीं ........

मैंने उसको उसने मुझको आज तक जाना नहीं,
यूँ गुज़र जाते हैं दोनों जैसे पहचाना नहीं ।
मैंने उसको उसने  मुझको.........

सब मोहब्बत की किताबें हैं नहीं मैंने पढ़ी ,
कैसे मैं कह दूँ हमारे जैसा अफसाना नहीं ।
मैंने उसको उसने  मुझको.........


नाप आयी आज चिड़िया आसमाँ सारा मगर,
क्या तसल्ली दे वो खुद को क्यों मिला दाना नहीं ।
मैंने उसको उसने  मुझको.........

है बदौलत जिनकी हिन्दू मुस्लिमों में वैर अब,
सबके घर जाकर वो कहते उसके घर जाना नहीं ।
मैंने उसको उसने  मुझको.........

आज से ज्यादा कहीं तब मेरा घर महफूज़ था ,
जब मोहल्ले में हुआ करता कोई थाना नहीं ।
मैंने उसको उसने  मुझको.........

-भारत भूषण शर्मा
(२७ सितम्बर २०१३ )

याद आती है बता ????

क्या तुझे मेरी कहानी याद आती है बता-३ 
प्रीत वो बरसों पुरानी याद आती है बता । 
क्या तुझे मेरी कहानी ......... 

खेल मेले और तमाशे देखे बैठे गोद में  -३ 
क्या हसीं वो ज़िन्दगानी याद आती है बता । 
क्या तुझे मेरी कहानी याद........... 

अपने बच्चों की कभी आँखों में तुझको झाँककर -३  
क्या मेरी आँखें पुरानी याद आती हैं बता । 
क्या तुझे मेरी कहानी........... 

तू जवां होने लगा तन घिस दिया तेरे लिए -३  
क्या मेरी ढलती जवानी याद आती है बता । 
क्या तुझे मेरी कहानी ........... 

जिसके पल्लू ने तेरा हर अश्क़ पोंछा है सदा -३  
माँ की वो साड़ी पुरानी याद आती है बता । 
क्या तुझे मेरी कहानी याद आती है बता । 

-भारत भूषण शर्मा 
(२८ जुलाई २०१५)

Wednesday, February 11, 2015

पेशावर में सैनिक स्कूल हमले पर…

 विद्या के मंदिर को तूने क़ब्रिस्तान बना डाला 
बारूदों के ऊपर कैसा  पाकिस्तान बना डाला 

तेरा पाल सांप तेरा ही आँगन सूना कर देगा 
दुनिया के नक़्शे में तुझको सिर्फ नमूना कर देगा 
औरों के घर आग लगाने की तू बंद दुकानें कर 
वरना तेरे ही घर म नुक्सान ये दूना कर देगा 
तूने इन सर्पों को खुद से भी बलवान बना डाला 
बारूदों के ऊपर कैसा पाकिस्तान बना डाला 

अरे पाक के वीर सैनिकों वर्दी को मत लाल करो 
तुमने बच्चों को खोया है कुछ तो ज़रा ख्याल करो 
सरहद के इस पार कभी बारूद फेंकने से पहले 
माँ बिन बच्चों कैसे जी ले खुद से कभी सवाल करो 
अपने घर आँगन में तूने क्यों शैतान बना डाला 
बारूदों के ऊपर कैसा पाकिस्तान बना डाला 

तू रख थोड़ा मौन इन्हे हम ऐसा एक सिला देंगे 
हिन्द के सैनिक दिन भर में छठवीं का दूध पिला देंगे 
तालिबान हाफ़िज़ लखवी दाऊद जो हैं सब सुन लेना 
अपनी पर आगये अगर मिटटी में तुम्हें मिला देंगे 
फिर मत कहना दुनिया से क्यों नाम निशान मिटा डाला 
बारूदों के ऊपर कैसा पाकिस्तान बना डाला 


Monday, January 5, 2015

वफ़ा.…

मुझे लहरों ने लूटा है समुन्दर में कहाँ दम था
जला दिल प्यार में आँखों में जब बारिश का मौसम था
मिली मंज़िल ना चाहत को तो ये एहसास होता है
वफ़ा  मेरी भी कच्ची थी तुम्हारा प्यार भी कम था।
-भारत भूषण शर्मा